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Karauli Shankar Mahadev:विश्वास के गंगा नदी के जल पर चला बालक

एक दिन “करौली (Karauli Sarkar) शंकर महादेव धाम, उत्तरप्रदेश(भारत)” में गुरुदेव श्री, आमलोगों के साथ संवाद कर रहे थे। उन्होंने उपस्थित सभी लोगो को संबोधित करते हुए कहा कि “बिना विश्वास” का कोई चीज संभव नहीं। जब कोई व्यक्ति किसी चीज, व्यक्ति या घटना पर विश्वास करता है और परिश्रम करते हुए, अपनी मंजिल की दिशा में विश्वास के साथ आगे बढ़ता है तो उसे मंजिल जरूर प्राप्त होती हैं और उसका कर्म, सफल होता हैं।

करौली सरकार: तपस्वी और जिद्दी बालक की कहानी

इस संदर्भ में उन्होंने एक “गुरु और शिष्य” की कहानी सुनाई जिसे मैं आप लोगो के सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूं।

गुरुजी बोले कि गंगा नदी के किनारे एक वृद्ध तपस्वी, तपस्या कर रहे थे। उन्हें तपस्या की इस स्तिथि में वहां के आमलोग देखा करते थें। उन आम लोगो में एक “जिद्दी लड़का” भी रहता था। वे हमेशा गंगा नदी आता था और स्नान किया करता था। स्नान के बाद वो जल में तैरती हुई मछलियों को काफी देर तक निहारता रहता था। एक दिन उसके मन में ख्याल आया कि इस पावन पवित्र गंगा नदी के बीच में जाकर मछलियों को देखना चाहिए । ऐसा सोचकर जैसे ही वो पानी के अंदर घुसा और बीच नदी की ओर जाना चाहा वैसे ही वो जल में डूबने लगा। जान को खतरा जानकर वो किसी प्रकार नदी से बाहर आ गया।

नदी से बाहर आने के बाद जिद्दी लड़का वही बैठा रहा और सोचता रहा कि जल में घुसकर बीच नदी में जाना संभव नहीं। यदि मैने ऐसा किया तो मैं डूब जाऊंगा और मर जाऊंगा। लेकिन उसे बीच नदी में जाने की तीव्र इच्छा हो रही थी। कुछ समझ नही आने पर उन्होंने अपना सिर हिलाकर आसपास देखा तो उन्होंने पाया कि एक साधु महाराज तपस्या कर रहे हैं। उन्होंने सोचा क्यों न, इस संत से कुछ सहायता ली जाय। साधु लोग तो बहुत शक्तिशाली होते हैं। वे कुछ भी कर सकते हैं। हो सकता है, गुरुजी मुझको गंगा नदी के ऊपर चलने का आशीर्वाद दे दे।

करौली शंकर महादेव: तपस्वी और बालक में संवाद और विवाद

ऐसा सोचकर “जिद्दी लड़का ” उस संत के पास चला गया और हाथ जोड़कर महात्मा को प्रणाम किया। तपस्वी संत बच्चे की आवाज सुनकर अपनी आंखे खोल दिए। उन्होंने देखा कि एक बच्चा मेरे सामने हाथ जोड़कर खड़ा हैं। महात्मा बोले: क्या हुआ बालक। बालक ने हाथ जोड़कर कहा कि गुरुजी मुझको गंगा नदी पर चलने का आर्शीवाद दीजिए। संत बोले: यह संभव नहीं। तब बच्चा बोला कि मैंने सुना है “गुरुमंत्र” में बहुत ताकत होती हैं। यदि मैं उस मंत्र का जाप करूंगा तब इस गंगा नदी के ऊपर चल सकूंगा।

महात्मा, उस बालक की भोली बातें सुनकर बोले कि बेटा ऐसा नहीं होता हैं। तुम नदी के ऊपर कैसे चल सकते हो, ये संभव नहीं हैं इसलिए तुम अपना घर लौट जाओ। बालक बहुत जिद्दी था वो महात्मा से “गुरुमंत्र” देने का जिद्द करने लगा और बोला कि बिना गुरुमंत्र लिए नहीं जाऊंगा। कुछ देर बाद, महात्मा उस बालक पर क्रोधित हो गए और बोले “जाता है यहां से या, मैं तुझको श्राप दूं”। बच्चा श्राप के डर से चला गया लेकिन अगला दिन फिर आया और फिर हाथ जोड़कर प्रणाम किया। महात्मा देखे कि वही बच्चा फिर से आ गया। महात्मा बोले “क्या चाहिए तुमको!” बच्चा बोला ” गुरुजी! गुरुमंत्र दे दीजिए”। महात्मा मना कर दिए और बोले “यहां से जाओ”। लेकिन बच्चा जाए ही नहीं वो वही महात्मा के सामने बैठ गया और गुरुमंत्र मांगने लगा। कुछ देर इसी प्रकार से दोनो में बातचीत होने पर फिर से महात्मा गुस्सा गए और बोले “जाता है यहां से या, मैं तुझको श्राप दूं”। बच्चा फिर श्राप के डर से चला गया लेकिन अगला दिन फिर आया और फिर उसी प्रकार से उस महात्मा से गुरुमंत्र देने का जिद्द करने लगा। 4/5 दिन किसी प्रकार से महात्मा ने बच्चा को भगा दिया लेकिन बच्चा के बार – बार आ जाने से वो परेशान रहने लगे और उन्होंने सोचा कि इस अबोध बालक को क्या श्राप दे। चलो इसको कोई गुरुमंत्र ही दे देते है।

ऐसा सोचकर उन्होंने उस बालक को अपने गुरु से प्राप्त मंत्र को उस बालक को गुरुमंत्र के रूप में दे दिया। बालक गुरुमंत्र पाकर बहुत खुश हुआ और फिर बोला: बाबाजी! गंगा नदी के ऊपर चलने के लिए, इसे कितनी बार जपना होगा। बालक के मूंह से ऐसा सुनकर महात्मा मन में सोचने लगे कि आज तक मैं नदी के ऊपर चल नही सका, यह क्या चलेगा। इसको मंत्र जाप करने से कुछ लाभ होने वाला नहीं हैं। लेकिन इस जिद्दी बालक को कुछ संख्या बताना ही होगा वरना यह यहां से नहीं जायेगा और मुझे परेशान करते रहेगा। उन्होंने मन में ऐसा सोचकर उस बालक से कहा कि बच्चा तुम एक करोड़ बार इस मंत्र का जाप करना होगा। बच्चा, संत को प्रणाम कर चला गया और नियमित रूप से विश्वास के साथ उस मंत्र का जाप करने लगा और उस संत के पास जाना छोड़ दिया। इस संत महाराज ऐसा सोचकर खुश रहने लगे कि बहुत मुश्किल से ” एक जिद्दी लड़का” से जान छूटा। मैने उसे इतनी बार मंत्र जाप करने बोल दिया है जो उसके वश का नहीं। अब वो ना ही तो कभी इतना मंत्र जाप कर सकेगा और ना ही कभी द्वारा यहां आएगा।।

Karauli Shankar Mahadev: बालक को गुरुमंत्र का जाप करना और उसके लाभ

उस बच्चा को गुरुमंत्र जाप के साथ – साथ इच्छा प्रबल होने लगी कि अब मैं एक दिन जरूर गंगा नदी के ऊपर चल सकूंगा। बच्चा काफी श्रद्धा – विश्वास के साथ दिन – रात मंत्र जाप करने लगा। वो समय पर खाना – पीना छोड़ दिया क्योंकि उसे खाने की सुध ही नहीं रहती थी। वो हमेशा मंत्र जाप में लगा रहता था ।लोग समझने लगे कि ये पागल होता जा रहा है।कई महीने तक लगातार यही प्रक्रिया जारी रही। लड़का को लगा कि अब मेरा एक करोड़ मंत्र पूरा हो चुका हैं।वो खुशी से झूम उठा और संत महाराज की ओर जाने लगा।लेकिन तभी उसे ध्यान आया कि संत महाराज कितना मुश्किल से उसे गुरुमंत्र दिए हैं। यदि एक करोड़ मंत्र जाप नहीं हुआ होगा तब वो मुझे फिर वापस भेज देंगे। ऐसा सोचकर वो घर लौट आया और फिर मंत्र जप करने लगा जब उसे लगा कि 50 लाख मंत्र जप लिए तब उन्होंने सोचा कि अब किसी भी प्रकार से मैं एक करोड़ से अधिक बार जरूर मंत्र जाप किया होगा। अब महात्मा जी मुझे लौटा नहीं सकते।

ऐसा सोचकर बच्चा फिर उसी महतमा के पास गया और सिर झुकाकर प्रणाम किया। जब उस तपस्वी संत ने अपनी आंखे खोली तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने देखा कि वही जिद्दी बालक फिर मेरे सामने खड़ा हैं। अब क्या हुआ इसे। उस समय तो इतना मेहनत से मैने इसे भेजा था। महात्मा जी! आश्चर्य से पूछे बोलो क्या हुआ! बच्चा बोला कि गुरु महाराज मैने एक नहीं डेढ़ करोड़ बार गुरुमंत्र का जाप किया हैं। महात्मा को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये छोड़ा – सा बच्चा इतना मंत्र कैसे जप सकता हैं। उन्होंने बच्चे की बात को टालने का प्रयास किया किंतु बच्चा का गंगा नदी के ऊपर चलने की इच्छा प्रबल थी। इसलिए सच्चा बोला “गुरु महाराज मैने निश्चित रूप से एक करोड़ से ज्यादा बार मंत्र जाप किया हैं इसलिए अब निःसंकोच हमारे साथ चलने का कष्ट कीजिए।

Karoli Mahadev: संत महाराज की विवशता और बालक की जिद्द

संत महाराज ने सोचा कि आज तो और बड़ी समस्या में घिर गए। यदि बालक के साथ गया तो इसके साथ – साथ मैं भीं जल में डुब कर मरूंगा। अपने आप को मुसीबत में फंसा जानकर वो इस बालक से छुटकारा पाने का प्रयास करने लगे। लेकिन, बालक बहुत जिद्दी था वो संत के पैर में लिपट गया और गंगा नदी के ऊपर चलने का जिद करने लगा। बहुत देर यही स्तिथि रहने पर संत महाराज विवश हो गए और बोले ठीक है, हम तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हैं लेकिन एक शर्त है कि तुम आगे – आगे चलोगे। बालक बोला ठीक है महाराज।

दोनो गंगा नदी के जल के ऊपर चलने के लिए तैयार हो गए। इधर दोनों की दो स्तिथि बनी हुई थी। अबोध बालक पूरा खुश था कि आज मैं गंगा नदी के बीच में जा सकूंगा और इसके विपरित संत महाराज काफी उदास थे कि आज ये पागल बच्चा भी जल में डुब कर मरेगा और मैं भी मरूंगा लेकिन गुरुमंत्र यही संत दिए थे इसलिए अब भाग नहीं सकते थे। उनकी विवशता थी बालक के साथ चलना। मृत्यु निकट जानकर संत महाराज अपना गुरुदेव को याद किए।

Karauli Shankar: बालक के गंगा नदी के ऊपर चलना और संत का जल में डुबना।

इधर बच्चा आगे – आगे खुशी पूर्वक चलता हुआ तेजी से आगे बढ़ गया और संत महाराज पीछे छूट गए। गुरुमंत्र की जाप की शक्ति पर विश्वास करके बच्चा, खुशी – खुशी गंगा नदी में प्रवेश किया। उन्होंने देखा कि वो गंगा नदी में नहीं डूब रहा है । उसका खुशी का ठिकाना नहीं रहा है वो संत महाराज का याद भी भूल गया और उछलता – कूदता हुआ, गंगा नदी के ऊपर तेजी से दौड़ने लगा और गंगा नदी के दूसरी छोर पर चला गया। जब उसे संत महाराज की याद आई तो उन्होंने देखा कि संत महाराज तो आए नहीं। वो संत महाराज को लेने के लिए फिर से उछलता – कूदता हुआ नदी के ऊपर से दौड़ते हुए आने लगा।

इधर संत महाराज ने देखा कि बच्चा सही में गंगा नदी के ऊपर चल रहा है। उनको अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसे कैसे संभव हुआ। आज तक मैं क्यों नही चल सका। उनका सारा भय समापत हो गया। वो खुश होने लगे और सोचने लगे कि बेकार मैं परेशान था। जब मेरा शिष्य, मेरे दिए गुरुमंत्र को जापकर नदी के जल के ऊपर चल सकता है तो मैं भीं जरूर चल सकता हूं। ऐसा सोचकर वो गंगा नदी में उतर आए लेकिन उन्होंने जैसे ही नदी में प्रवेश किया वो नदी में डूबने लगे। ऐसा देखकर, संत महाराज जोर – जोर से चिल्लाने लगे और अपना हाथ – पांव मारना शुरू कर दिए। उधर बच्चा भी वापस इस किनारे पर पहुंचने वाला था। उन्होंने नदी में, एक डूबता हुआ व्यक्ति को देखा। तब उन्होंने उस व्यक्ति को पकड़कर नदी से बाहर निकाला । जैसे ही उन्होंने उस व्यक्ति को देखा तो बच्चा को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि वो व्यक्ति उसके गुरु महराज ही थे।

उन्होंने संत महाराज से पूछा महाराज! आप नदी में डुब रहे थे तो मैं कैसे नदी के ऊपर चल रहा था। मैं तो आपही का शिष्य हूं। दोनो घोर आश्चर्य में गंगा नदी के किनारे बैठे हुए थे तभी संत महाराज के गुरुजी वहां आ गए। दोनो ने उन्हें प्रणाम किया और बैठने के लिए कहा। उसके बाद उन्होंने पूरी घटना अपने गुरुजी को बताए।

Baba Karauli Dham: श्रद्धा – विश्वास की शक्ति और गुरुकृपा।

तब संत महाराज के गुरुजी बोले कि यह प्रकृति ईश्वर द्वारा रचित और संचालित है। जो भी व्यक्ति सच्चे मन से इस प्रकृति के नियमो को पालन करता है। अपनी प्रक्रिया में स्थिर रहकर, उसमे विश्वास करके ईश्वर को याद करता है वो जरूर सफल होता है जैसे यह बालक, जल के ऊपर चलने में सफल हुआ जबकि तुम जल में डुब गए।

तब गुरुदेव करौली शंकर महादेव ने कहा कि बालक ने अपनी सच्ची श्रद्धा – विश्वास से वो कर दिखाया जो एक वृद्ध तपस्वी नहीं कर सके इसलिए आवश्यकता ईश्वर में विश्वास करने, उसके प्रति श्रद्धा – विश्वास रखने की हैं। जो भी व्यक्ति सच्चे मन से ईश्वर को याद करता है। अपना कर्म में स्थिर रहता हैं और अपनी मंजिल पाने की सतत प्रयास करता हैं वो जरूर सफल होता हैं।यह इस पवित्र प्रकृति का नियम है जो सभी के लिए समान हैं।

2 thoughts on “Karauli Shankar Mahadev:विश्वास के गंगा नदी के जल पर चला बालक”

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